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Ike
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Very unusual and interesting thread.
 
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Discussion Starter · #18 ·
MAHABODHI TEMPLE,BODHGAYA,INDIA. महाबोधि मंदिर

यह मंदिर मुख्*य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्*थापित स्*तूप के समान हे। इस मंदिर में बुद्ध की एक बहुत बड़ी मूर्त्ति स्*थापित है। यह मूर्त्ति पदमासन की मुद्रा में है। यहां यह अनुश्रुति प्रचिलत है कि यह मूर्त्ति उसी जगह स्*थापित है जहां बुद्ध को ज्ञान निर्वाण (ज्ञान) प्राप्*त हुआ था। मंदिर के चारों ओर पत्*थर की नक्*काशीदार रेलिंग बनी हुई है। ये रेलिंग ही बोधगया में प्राप्*त सबसे पुराना अवशेष है। इस मंदिर परिसर के दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रा*कृतिक दृश्*यों से समृद्ध एक पार्क है जहां बौद्ध भिक्षु ध्*यान साधना करते हैं। आम लोग इस पार्क में मंदिर प्रशासन की अनुमति लेकर ही प्रवेश कर सकते हैं।

इस मंदिर परिसर में उन सात स्*थानों को भी चिन्हित किया गया है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्*ित के बाद सात सप्*ताह व्*यतीत किया था। जातक कथाओं में उल्*लेखित बोधि वृक्ष भी यहां है। यह एक विशाल पीपल का वृक्ष है जो मुख्*य मंदिर के पीछे स्थित है। कहा जाता बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्*त हुआ था। वर्तमान में जो बोधि वृक्ष वह उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढी है। मंदिर समूह में सुबह के समय घण्*टों की आवाज मन को एक अजीब सी शांति प्रदान करती है।

मुख्*य मंदिर के पीछे बुद्ध की लाल बलुए पत्*थर की 7 फीट ऊंची एक मूर्त्ति है। यह मूर्त्ति विजरासन मुद्रा में है। इस मूर्त्ति के चारों ओर विभिन्*न रंगों के पताके लगे हुए हैं जो इस मूर्त्ति को एक विशिष्*ट आकर्षण प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि तीसरी शताब्*दी ईसा पूर्व में इसी स्*थान पर सम्राट अशोक ने हीरों से बना राजसिहांसन लगवाया था और इसे पृथ्*वी का नाभि केंद्र कहा था। इस मूर्त्ति की आगे भूरे बलुए पत्*थर पर बुद्ध के विशाल पदचिन्*ह बने हुए हैं। बुद्ध के इन पदचिन्*हों को धर्मचक्र प्रर्वतन का प्रतीक माना जाता है।

बुद्ध ने ज्ञान प्राप्*ित के बाद दूसरा सप्*ताह इसी बोधि वृक्ष के आगे खड़ा अवस्*था में बिताया था। यहां पर बुद्ध की इस अवस्*था में एक मूर्त्ति बनी हुई है। इस मूर्त्ति को अनिमेश लोचन कहा जाता है। मुख्*य मंदिर के उत्तर पूर्व में अनिमेश लोचन चैत्*य बना हुआ है।

मुख्*य मंदिर का उत्तरी भाग चंकामाना नाम से जाना जाता है। इसी स्*थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्*ित के बाद तीसरा सप्*ताह व्*यतीत किया था। अब यहां पर काले पत्*थर का कमल का फूल बना हुआ है जो बुद्ध का प्रतीक माना जाता है।

महाबोधि मंदिर के उत्तर पश्*िचम भाग में एक छतविहीन भग्*नावशेष है जो रत्*नाघारा के नाम से जाना जाता है। इसी स्*थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्*ित के बाद चौथा सप्*ताह व्*यतीत किया था। दन्*तकथाओं के अनुसार बुद्ध यहां गहन ध्*यान में लीन थे कि उनके शरीर से प्रकाश की एक किरण निकली। प्रकाश की इन्*हीं रंगों का उपयोग विभिन्*न देशों द्वारा यहां लगे अपने पताके में किया है।

माना जाता है कि बुद्ध ने मुख्*य मंदिर के उत्तरी दरवाजे से थोड़ी दूर पर स्थित अजपाला-निग्रोधा वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्*ित के बाद पांचवा सप्*ताह व्*य*तीत किया था। बुद्ध ने छठा सप्*ताह महाबोधि मंदिर के दायीं ओर स्थित मूचालिंडा क्षील के नजदीक व्*यतीत किया था। यह क्षील चारों तरफ से वृक्षों से घिरा हुआ है। इस क्षील के मध्*य में बुद्ध की मूर्त्ति स्*थापित है। इस मूर्त्ति में एक विशाल सांप बुद्ध की रक्षा कर रहा है। इस मूर्त्ति के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार बुद्ध प्रार्थना में इतने तल्*लीन थे कि उन्*हें आंधी आने का ध्*यान नहीं रहा। बुद्ध जब मूसलाधार बारिश में फंस गए तो सांपों का राजा मूचालिंडा अपने निवास से बाहर आया और बुद्ध की रक्षा की।

इस मंदिर परिसर के दक्षिण-पूर्व में राजयातना वृ*क्ष है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्*ित के बाद अपना सांतवा सप्*ताह इसी वृक्ष के नीचे व्*यतीत किया था। यहीं बुद्ध दो बर्मी (बर्मा का निवासी) व्*या*पारियों से मिले थे। इन व्*यापारियों ने बुद्ध से आश्रय की प्रार्थना की। इन प्रार्थना के रुप में बुद्धमं शरणम गच्*छामि (मैं अपने को भगवान बुद्ध को सौंपता हू) का उच्*चारण किया। इसी के बाद से यह प्रार्थना प्रसिद्ध हो गई।
0016 by ski_logan, on Flickr
 
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